कथा कच्च और देवयानी की

प्रेम क्या है?

भौतिक जगत में प्रेम की परिभाषा भौतिक पदार्थों या फिर अन्य जीव प्राणी में स्नेह भाव से दी जाती है। पुरुष का स्त्री के संग और स्त्री का पुरुष के प्रति परस्पर रूप से आकर्षण व लगन भाव ही भौतिक जगत का प्रेम कहलाता है। या फिर अपने परिवार व सगे संबंधियों से जो हमें मैत्री भाव होता है उसे हम प्रेम कहते है।

भगवान् स्वामिनारायण अपने द्वारा कहे गए ग्रन्थ वचनामृत में कहते है कि जिस दिन से परमेश्वर ने इस सृष्टि की रचना की है उस दिन से उन्होंने ऐसी चाभी घुमाई है कि उन्हें फिर से परिश्रम न करना पड़े तथा संसार की जो वृद्धि करनी है, वह अपने आप होती रहे, ऐसा चक्र चला रखा है। इसलिए, पुरुष को स्त्री से और स्त्री को पुरुष से सहज प्रेम हो जाता है तथा स्त्री से उत्पन्न होनी वाली संतान से भी सहज स्नेह हो जाता है। वस्तुतः वह भगवान् की स्नेहरूपी माया ही है।

जिस प्रकार से खिलोने में चाभी घुमाने पर खिलौना अपने आप दौड़ने लगता है उसी प्रकार जो भगवान् की मायारुपी चाभी है वो निरंतर इस संसार को चलाती रहती है। इसी प्रकार से भौतिक जगत का जो प्रेम होता है वो भी भौतिक देह के समाप्त होने के साथ ही नष्ट हो जाता है।

तो वास्तविक प्रेम क्या है?

क्या इस से बढ़कर भी कोई प्रेम है?

उस विषय में हमारे संत और हमारे शास्त्र बताते है कि यदि किसी जीव को भगवान् और भगवान् के अखंडधारक संत में वृत्ति लग जाये और उनसे प्रेम हो जाए तो उसका कल्याण निश्चित है। ऐसे कितने ही उदहारण हमें मिलते है जैसे मीराबाई, नरसी मेहता, रसखान, सबरी माता जी और भी कितने भगवान् के अनन्य भक्तों ने भगवान् में मन लगाकर उनसे प्रीती कर अपने जीवन को सार्थक किया।

देवताओं की असुरों के साथ निरंतर पराजय के बाद देवों के राजा इंद्र ने एक सभा बुलाई। उस सभा में यह चर्चा हुई कि कैसे असुर हर बार देवताओं से आगे निकल कर उन्हें परास्त कर देते हैं? कैसे देव लोग असुरों सामने दुर्बल पड़ जाते हैं?
उस समय वहां पर देवगुरु बृहस्पति भी उपस्थित थे। उन्होंने देवताओं के समक्ष यह बात रखी कि अवश्य ही असुरों ने युद्ध कौशल में प्रवीणता प्राप्त कर ली है। जब देवता संगीत और कला के भोगों में चूर थे तो असुर उस समय आयुष विद्या और धनुर विद्या की साधना कर रहे थे। और तो फिर असुरों के गुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या का भी अनुसन्धान था। जिस से युद्ध भूमि में पड़ा बुरी तरह से घायल मृत प्रायः योद्धा भी जीवित हो उठे।

वो देवराज इंद्र से कहते है, ‘हे इंद्र, जीवन का विकास युद्धों की विजय में नहीं, निरंतर ज्ञान की उपासना में ही जीवन का विकास है।’

तो फिर यह निष्कर्ष निकला कि अगर देवताओं को असुरों से युद्ध में विजय प्राप्त करनी है तो उन्हें आचार्य शुक्र से संजीवनी विद्या का ज्ञान हासिल करना होगा। परन्तु वहां असुरों के स्थान में जायेगा कौन? बस यही एक बड़ा प्रश्न उनके सामने उपस्थित था।

यह बात जब देवगुरु बृहस्पति के पुत्र कच्च को मालूम पड़ी तो देवगण की रक्षा के लिए वह वहां जाने को तैयार हो गया।

कच्च वहां से सीधा आचार्य शुक्र के आश्रम पहुंचा और यज्ञ की लकड़ियों को वहां उनके चरणों में रखकर उसने शुक्राचार्य से कहा – ‘आचार्य मैं यज्ञ की समिधा ले आया हूँ।’

शुक्राचार्य ने कच्च से उसका परिचय पूछा, तो प्रत्युत्तर में कच्च ने कहा – ‘मैं देवताओं के गुरु बृहस्पति का पुत्र कच्च हूँ।’

तो उन्होंने उसके वहां आने का प्रयोजन पूछा, तो कच्च ने कहा कि ‘ज्ञान और विज्ञान में मेरे पिता से और कौन स्पर्धा कर सकता है, मैं तो दोनों से श्रेष्ठ प्राप्त कर सकूँ बस यही उनकी इच्छा है।’

शुक्राचार्य कच्च की निर्भीकता और सादगी देखकर प्रसन्न हुए उन्होंने उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया। और कच्च भी वहीं गुरु आश्रम में रहकर ज्ञान की साधना में लग गया।

Shukracharya_and_Kacha

जब असुरों को इस बात का पता चला तो उनसे रहा नहीं गया वो इस की शिकायत लेकर शुक्राचार्य के पास पहुंचे तो शुक्राचार्य ने ये कहकर उन्हें वहां से भेज दिया कि कच्च में उन्हें एक ज्ञान के प्रति निष्ठावान शिष्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखता और वो खुद भी सचेत हैं।

असुरों में भय का मानो एक विस्फोट हुआ हो उन्हें लगा कि अगर शुक्राचार्य ने कच्च को संजीवनी विद्या सीखा दी तो जो प्राथमिकता वो युद्ध में देवताओं के प्रति हासिल करते थे वो कहीं ख़तम न हो जाये। इसी कारण उन्होंने एक दिन जंगल में पशुओं को चराने गए कच्च को अकेला देखकर उसे मार दिया।

शाम को जब सारी गाएं वापस लौटी तो उनके साथ कच्च कहीं नजर नहीं आया। शुक्राचार्य जी की एक पुत्री थी उसका नाम देवयानी था। देवयानी मन ही मन कच्च को पसंद करती थी। जब कच्च का कोई समाचार नहीं मिला तो वो व्याकुल हो उठी। अपने पिता के पास जाकर अपने भय और अपनी पीड़ा को उसने स्पष्ट किया और उनसे आग्रह भी किया कि निश्चित ही असुरों ने कच्च को मार दिया है तो कृपया कर के आप उसे संजीवनी विद्या से जीवित कर के वापस बुला लीजिये।

संतान मोह में विवश शुक्राचार्य ने कच्च को पुनर्जीवित कर दिया।

तो एक बार फिर असुरों ने मौका देखकर कच्च को मार डाला। देवयानी के पुनः आग्रह पर कच्च वापस जीवित हो उठा। तीसरी बार असुरों ने मिलकर एक षड्यंत्र रचा उन्होंने कच्च को मारकर उसके शरीर को जला दिया और जो राख उसमे से बची वो उन्होंने शुक्राचार्य के सोमरस में मिला कर उन्हें ही पीला दी। अब बाद में जब शुक्राचार्य ने कच्च को आवाज लगायी तो मालूम चला कच्च तो उनके उदर में था। शुक्राचार्य को इस बात पर बहुत पछतावा हुआ। परन्तु देवयानी फिर आग्रह करने लगी, उसने कच्च को बचाने के लिए उनसे फिर प्राथना की। परन्तु यह कैसे संभव था? इस बार उन्होंने कच्च को संजीवनी विद्या का रहश्य बता दिया और फिर उसी विद्या से उन्होंने कच्च को दुबारा जीवित कर दिया। कच्च जब शुक्राचार्य का पेट चीरकर बाहर निकला तो अपने पिता की मृत्यु पर देवयानी फिर व्यथित होकर रोने लगी। तब कच्च ने शुक्राचार्य से जो संजीवनी विद्या का ज्ञान प्राप्त किया था उसी से उन्हें पुनः जीवित कर दिया।

अध्ययन समाप्त होने पर कच्च अपने गुरु से आशीर्वाद लेकर वापस घर की ओर निकल पडा। तो देवयानी जो कि कच्च से प्रेम करती थी वो उनके समक्ष जाकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रख बैठी। परन्तु कच्च ने यह कहकर इंकार कर दिया कि वो गुरु पुत्री है और गुरु पिता समान होते हैं इसी तरह वो उनकी बहन हुई तो वो उनसे विवाह नहीं कर सकते। यह सुनकर देवयानी को मानो कोई झटका लगा हो, क्रोध में आकर उसने कच्च को श्राप दे दिया कि जिस संजीवनी विद्या के उद्देश्य से वो यहाँ आया था युद्ध में जब उसे उसकी सबसे ज्यादा जरुरत होगी तब वह विद्या उसके काम नहीं आएगी।

कच्च भी चुपचाप इसे स्वीकार कर देवलोक लौट गया।

इस प्रकार कच्च ने एक आदर्श प्रस्थापित किया। गुरु पुत्री बहन समान होती है। जो मर्यादा हमें हमारे माता पिता और गुरु सिखाते है उन मर्यादाओं का कैसे पालन करना है यह बात हमें शास्त्रों से पता चलती है। महाभारत में उल्लेखित यह प्रसंग हमें कच्च का अपने गुरु के प्रति और अपने बड़ों के प्रति जो निष्ठा और आदर भाव है यह परिलक्षित करता है। इसके साथ ही देवयानी का कच्च के प्रति भौतिक प्रेम यह भी दर्शाता है कि जो मोह हमें इस जगत और इस जगत से जुड़े जीवों और पदार्थों के प्रति रहता है वो कितना क्षणिक है। जिस प्रकार कांच हलकी सी ठेस से टूट के बिखर जाता है उसी प्रकार हमारा यह प्रेम भी हलके अहंकार के चोट लगने पर ही टूट के बिखर जाता है।

तो जरुरत है आत्मचिंतन की – क्या जो प्रेम हम इस संसार से करते है वो कितना वास्तविक है? उससे क्या लाभ है? क्या ये वास्तव में कोई बंधन है जो हमें इस संसार से जकड़े रखता है? अगर ये बंधन है तो सही अर्थ में प्रेम का अर्थ क्या है?

प्रश्न करो।
क्यूंकि सही प्रश्न ही सही दिशा की ओर हमें प्रेरित करते हैं।

Jai Swaminarayan

Gaurav S Kaintura

07 May 2020

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