दो ग्वालों की कथा

एक बार एक गाँव में दो ग्वाले रहते थे। दोनों मित्र रोज सुबह गाय चराने निकल जाते और देर शाम घर लौटते। दोनों की परिस्थिति भी लगभग एक समान थी। एक समय गाँव में भयंकर वर्षा हुई और नदियां सब उफ़ान भरने लगी। लोग आस पास से इकठ्ठा होकर गाँव के बाहर बाढ़ देखने को जाने लगे। तब वो ग्वाले जो उस समय वहीँ बैठे थे उन्होंने भी सोचा कि चलकर बाढ़ देखि जाए। और वो दोनों पहुँच गए गाँव के बाहर एक किनारे। बाढ़ का पानी नदी के पानी के साथ इकठ्ठा होकर किनारे से ऊपर बह रहा था। तभी अचानक एक ग्वाले ने देखा कि बाढ़ के पानी के साथ नदी में एक काला कम्बल भी बहकर जा रहा था। उसने अपने दोस्त से कहा, ‘देखो वो कम्बल बहते हुए पानी में जा रहा है क्यों न हम उसे निकाल ले तो ठण्ड में वो हमे काम आएगा।’ दूसरा ग्वाला भी समझदार था वो बोला, ‘हाँ मैं जाता हूँ। मुझे तैरना भी अच्छी तरह से आता हैं।’ यह कहकर उसने नदी में छलांग लगा दी और जैसे ही उसने उस कम्बल को पकड़ा वो जान गया कि यह कम्बल नहीं बल्कि पानी में बह रहा भालू है। वो भालू कहीं से बह रहा था पानी में और उसने लगभग सारी आशाएँ छोड़ ही दी थी कि तभी ग्वाले ने पानी में छलांग लगायी और भालू को लगा कि जरूर मुझे बचाने के लिए मेरा तारणहार कोई मसीहा आया है, उसने भी ग्वाले को कसकर पकड़ लिया। अब जब भालू ने इस तरह से ग्वाले को पकड़ा तो वो ग्वाला डर गया और वो तैरना जानता था लेकिन डर के कारण वो कुछ न कर सका और धीरे धीरे पानी में डूबने लगा। किनारे पर खड़ा उसका मित्र उसे आवाज देकर पुकारता है, ‘भाई तू कम्बल को छोड़, भाई तू कम्बल को छोड़।’ डूबने से पहले उस ग्वाले ने बस इतना ही कहा, ‘मैंने तो कबका ये कम्बल को छोड़ दिया है पर अब ये कम्बल मुझे छोड़ता नहीं है।’

योगी जी महाराज और हमारे गुरु प्रमुख स्वामी महाराज कई बार ये कथा कहते हुए समझाते थे कि मनुष्य पहले पदार्थों की पीछे दौड़ता हैं उनको पकड़ता है, इकठ्ठा करता है और एक दिन इस जगत के पदार्थ उसे इसी तरह जकड लेते हैं। हम कितना प्रयास करें लेकिन जगत हमे फिर छोड़ता नहीं है।

वस्तुओं पर मिलकत पर हम अपना अधिकार मानते है, लेकिन कभी कोई मिलकत हमारे से ममता के साथ जुडी होती नहीं है। मिलकत कभी नहीं कहती कि, ‘ये मेरा मालिक है।’ हम जरूर कहते है ‘ये मेरी मिलकत है।’ उसको कोई सम्बन्ध नहीं है हमारे साथ।

कितने आये और कितने चले गए लेकिन इमारते नहीं रोया करती। उनको मतलब ही नहीं है। लेकिन इंसान जरूर रोता है ये मेरा घर, ये मेरा जमीन, ये मेरी दुकान। इसीलिए हमारे संत, हमारे शास्त्र हमे बताते है कि भौतिक पदार्थों के प्रति हमें आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। भौतिक जगत से प्रेम की अपेक्षा करना उसी प्रकार है जैसे रेगिस्तान में जल ढूंढ़ना। मृगतृष्णा बोलते हैं जिसे। रेगिस्तान में जब हिरन प्यास से व्याकुल होकर इधर उधर भटक रहा होता है तब उसे सामने पानी का बड़ा तालाब दिखाई देता है। वो दौड़ता है उसके पीछे और देखता है कि तालाब तो हैं ही नहीं। वो नहीं जानता कि ये तो प्रकाश के पूर्ण आंतरिक परावर्तन (Total Internal Reflection) की वजह से एक भ्रम है। वो फिर से सामने देखता है और उसे दूसरा तालाब सामने प्रतीत होता है। देखो प्रतीति से प्रीती जब तक होगी तब तक हम दौड़ते ही रहेंगे। उसी प्रकार हम भी इधर उधर सुख की एक बूँद की तलाश में निरंतर भटकते रहते है। और उसे ढूँढ़ते है कभी भौतिक संसाधनों में तो कभी किसी जीव प्राणी में लेकिन समझ नहीं पाते कि ये भी एक मृगतृष्णा है।

 

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कितनी अच्छी बात हमे मालुम होती है यहाँ इस कथा से कि जिस प्रकार हम बाहरी चीजों के पीछे भागते है एक दिन हम इतना थक जाते है कि वो हमारे अंदर घर कर जाती है और वासना का रूप ले लेती है जिससे की फिर पीछा छुड़ाना बहुत ही कठिन हो जाता है।

आज इस दृष्टांत से हम एक समझ लेते हैं ताकि जब जब हमारे कदम उन आसक्तियों की तरफ बड़े तो हमें याद रहे कि ये केवल मृगतृष्णा है और कुछ नहीं।

Jai Swaminarayan

Gaurav S Kaintura

09 May 2020

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